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आयà¥à¤°à¥à¤µà¥‡à¤¦ दà¥à¤¨à¤¿à¤¯à¤¾ की सबसे पà¥à¤°à¤¾à¤¨à¥€ चिकितà¥à¤¸à¤¾ पदà¥à¤§à¤¤à¤¿ में से à¤à¤• है।
विशà¥à¤µ की सबसे पà¥à¤°à¤¾à¤šà¥€à¤¨ चिकितà¥à¤¸à¤¾ पदà¥à¤§à¤¤à¤¿ आयà¥à¤°à¥à¤µà¥‡à¤¦
à¤à¤¾à¤°à¤¤ की ऋषि-मà¥à¤¨à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ बनाई गया आयà¥à¤°à¥à¤µà¥‡à¤¦ सिसà¥à¤Ÿà¤® दà¥à¤¨à¤¿à¤¯à¤¾ का सबसे पà¥à¤°à¤¾à¤¨à¤¾ व पà¥à¤°à¤à¤¾à¤µà¤¶à¤¾à¤²à¥€ चिकितà¥à¤¸à¤¾ पदà¥à¤¤à¤¿ में से à¤à¤• हैं। इसके जनक महरà¥à¤·à¤¿ चरक हैं। उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने चरक सहिंता में इसका गहराई से वरà¥à¤£à¤¨ किया हैं। इसके बाद उनके शिषà¥à¤¯ वागà¥à¤à¤Ÿà¥à¤Ÿ ऋषि ने इसका रिसरà¥à¤š व खà¥à¤¦ पर पà¥à¤°à¤¯à¥‹à¤— करके पूरी मानवजाति का कलà¥à¤¯à¤¾à¤£ किया। आज à¤à¥€ विदेशी लोग à¤à¤¾à¤°à¤¤ में आकर अपना इलाज करवा के जाते हैं। कà¥à¤¯à¥‹à¤‚कि हमारे आयà¥à¤°à¥à¤µà¥‡à¤¦ में किसी à¤à¥€ अंग को नà¥à¤•सान किये बिना इलाज किया जाता हैं। और रोग à¤à¥€ शत पà¥à¤°à¤¤à¤¿à¤¶à¤¤ खतà¥à¤® होता हैं। इसलिठपूरी दà¥à¤¨à¤¿à¤¯à¤¾ हमारे आयà¥à¤°à¥à¤µà¥‡à¤¦ को पसंद करती हैं। बहà¥à¤¤ सारे विदेशी लोग इस चिकितà¥à¤¸à¤¾ के करà¥à¤œà¤¦à¤¾à¤° रहेंगे कà¥à¤¯à¥‹à¤•ि बहà¥à¤¤ सारे लोगों की जिंदगी जाते-जाते इससे बची हैं। लेकिन दà¥à¤– की बात यह हैं, की यह à¤à¤¾à¤°à¤¤à¥€à¤¯ चिकितà¥à¤¸à¤¾ होने के बावजूद जà¥à¤¯à¤¾à¤¦à¤¾à¤¤à¤° à¤à¤°à¤¤à¥€à¤¯ इसे जानते तक नही।
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